- · माना कि मैं एक लेखक हूँ पर उदर रिक्त होता मेरा भी,
मेरे बालक भी करते इच्छा पकवानों, कंदुक, वस्त्रो की.
पर कैसे बोलू बात सरल सी खुद से, उनसे, अपनी भार्या से,
लेखक का कर्म बड़ा है, धर्मं बड़ा, और मर्म बड़ा, इन चीजो से.
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......मैं आज उठा हूँ नया रूप ले जग को नव जागृत करने,
दुखी जगत की झोली में आनंदित खुशिया भरने .
मैं भारत हूँ, मैं भारत हूँ, मैं आज पुनः से जागृत हूँ .
· हर राह पर हर मोड़ पर जो मुस्कुरा के चल गुजरते
जीवन की मुश्किल गालियो को हंसी ख़ुशी में पार करते
उनको ही जमाना कहता साधु! वे ही सज्जन है कहलाते
वे दूजो के हित जीते है अमृत दे विष भी पीते है
ज्यो हुंकारी झाँसी रानी पद्मिनी और पन्ना का त्याग,
देख आप को जागा मन में जीजा माँ, मीरा का वैराग .
छोड़ जगत का सरल प्रवाह नारी शक्ति बही विपरीत,
राष्ट्र धर्मं को मान स्वयं का, गाकर भारत माँ का गीत.
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