Tuesday, May 10, 2011

आधे लीटर गोमूत्र से 28 घंटे सीफलएल बल्ब जलाया जा सकता है

आधे लीटर गोमूत्र से 28 घंटे सीफलएल बल्ब जलाया जा सकता है

सिर्फ आधे लीटर गोमूत्र से आप 28 घंटे केवल एक सीफलएल बल्ब जला सकते हैं, बल्कि मोबाइल भी चार्ज कर सकते हैं। भौती गोशाला, कानपुर ने गोज्योति नाम से ऐसा लैंप विकसित किया है जिसमें आधा लीटर गोमूत्र से एक सप्ताह तक झोपड़ी रोशन की जा सकती है। खास बात यह है कि इस संयंत्र के उपयोग में अन्य किसी प्रकार का कोई खर्च नहीं होता।भौती गोशाला में एक ऐसी बैट्री तैयार की गई है जो सिर्फ गोमूत्र से चार्ज होती है। छह वोल्ट की इस बैट्री में आधा लीटर गोमूत्र डाल देते हैं, इसके बाद सीफल का बैट्री से कनेक्शन कर देते हैं।

सुविधानुसार स्विच भी लगा देते हैं। स्विच ऑन करते ही सीफल बल्ब जल उठती है। इस बैट्री से एक अन्य लिंक निकालकर मोबाइल चार्जर भी लगा दिया जाता है। गोशाला सोसाइटी के उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद प्रेम मनोहर के अनुसार, एक गोज्योति बनाने की लागत करीब डेढ़ हजार रूपये आती है। बल्क में बनाने पर यह लागत और भी घट सकती है। आधे लीटर गोमूत्र से 28 घंटे तक बल्ब जल सकता है।गोमूत्र के इस अनुंसधान ने आई.आई.टी और एचबीटीआई जैसे उच्च तकनीकी संस्थान भी हतप्रभ हैं।

उन्होंने भी माना कि गोमूत्र में वह शक्ति है, जिससे बल्ब जल सकता है। गोशाला की इस अनोखी गोज्योति को देखकर अभी गुजरात के एक स्वयंसेवी संगठन ने दो हजार लैंप तैयार करने का ऑर्डर भी दिया है। इसका अति पिछड़े गैर विद्युतीकृत ग्रामीण इलाकों में वितरण किया जाएगा। ध्यान रहे कि कानपुर गोशाला सोसायटी ने बीते वर्ष ही गोबर से सीएनजी तैयार की थी, जिससे सफलतापूर्वक कार चलायी जाती है। गोशाला सोसायटी के सदस्य सुरेश गुप्ता बताते हैं कि अगर सरकार गो-ज्योति को प्रोत्साहित करे तो देश की वे झोपड़ियां भी सहजता से रोशन हो सकती हैं जहां अभी बिजली की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

विकास के नाम पर कृषि का विनाश-

* सरकारें बड़े कल कारखानों के नाम पर प्रकृति और कृषि का विनाश कर रही है।

* इन उद्योगों से उतना रोजगार सृजन नहीं होता जितना लघु उद्योगो से होता है।

* पूँजीपतियों से कमीशन खाकर सरकारे इनको किसानों की उपजाऊ जमीने कौड़ियों के भाव बेच देती है।

* ये कल कारखाने पर्यावरण के लिए अत्यधिक घातक हैं, हमारी सभी नदियो का विनाश इन्ही वृहद कारखानो के कारण हुआ है।

* बड़ी बड़ी परियोजनाओ के नाम पर ठेकेदारो को फायदा पहुँचाने का षड्यंत्र होता है, जैसे की उत्तर प्रदेश मे शहरो की सड़कों का तो हाल बेहाल है, फिर एक्सप्रेस way की क्या जरूरत आन पड़ी।

* ये सरकारें तो राजशाही से भी गई गुजरी है, सोचते है, कि पाँच साल मिले है, जैसे भी लूट सको, जितना भी लूट सको लूट लो।

* इंडस्ट्रीज़ तो अनउपजाऊ भूमि पर भी बनाई जा सकती है, उपजाऊ भूमि तो सीमित है, फिर कृषि योग्य भूमि कैसे और किसी को दी जा सकती है ?

* विकास के नाम पर ये भूमि, जल , वायु सबको नाश कर देंगे, तब विकास को क्या सिर पर सजाओगे ?